तृतीय रत्न · प्रभाव की कहानियाँ

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दिगंबर कुमार: दूसरी कोशिश और आंध्र प्रदेश के एक रिज़ॉर्ट में फ्रंट ऑफ़िस

वह एंट्रेंस एग्ज़ाम की अपनी पहली कोशिश में नाकाम रहा। तृतीया रत्न ने उसे हार न मानने के लिए कहा — और दूसरी कोशिश का खर्च खुद उठाया।

दिगंबर कुमार बिहार के जहानाबाद की एक छोटी सी जगह से आते हैं — वही गाँव और वही साधारण किसान परिवार जहाँ से उनके भाई पृथ्वी राज आते हैं। उन्होंने आम सरकारी स्कूलों में पढ़ाई की और कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि आगे क्या करें।

 

तभी सुनीता दीदी ने उसे पटना जाकर कॉलेज में दाखिले के लिए होने वाली प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने को कहा। उसने छह महीने तक खूब पढ़ाई की — लेकिन उसके नंबर इतने अच्छे नहीं आए और वह फेल हो गया।

“मुझे बहुत दुख हुआ, लेकिन सुनीता दीदी और प्रसन्ना दीदी ने मुझसे कहा कि हिम्मत न हारूँ। उन्होंने मुझे नालंदा एकेडमी में शामिल होने के लिए कहा और बोले, ‘पैसे की चिंता मत करो। हम सारा खर्च उठाएँगे।”

उन्होंने आठ महीने तक नालंदा एकेडमी में पढ़ाई की और दूसरी बार में ही परीक्षा पास कर ली। इससे उन्हें सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ़ आंध्र प्रदेश में तीन साल के लिए ट्रैवल और टूरिज़्म की पढ़ाई करने का मौका मिला। 'तृतीय रत्न' ने उन्हें एक फ़ोन और लैपटॉप खरीदकर दिया ताकि वे बिना किसी रुकावट के पढ़ाई कर सकें।

 

आज, दिगंबर 'ट्रान्स वीचिका रिज़ॉर्ट' में फ्रंट ऑफिस सुपरवाइज़र के तौर पर काम करते हैं। वे कहते हैं, "मैं 'तृतीय रत्न' टीम का, और खासकर सुनीता दीदी और प्रसन्ना दीदी का बहुत-बहुत धन्यवाद करना चाहता हूँ, जिन्होंने हर कदम पर मेरी मदद की।"